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संस्थान की नियमावली

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युवा जागृति स्वयं सेवी सहायता संस्थान की                      संशोधित मूल नियमावली  (क) संस्थान का नाम         :-   युवा जागृति स्वयंसेवी सहायता संस्थान। (ख) परिभाषा-  1. संस्थान से अभिप्राय है     :-   युवा जागृति स्वयं सेवी सहायता संस्थान।  2. समिति से अभिप्राय है         :-   प्रशासनिक समिति, सलाहकार समिति औरकार्यकारिणी समिति। 3. पदाधिकारी से अभिप्राय है :- संस्थापक,व्यवस्थापक,संचालक,संयोजक,संपादक,अध्यक्ष,सचिव तथा कोषाध्यक्ष। 4. वर्ष से अभिप्राय है            :-  01 अप्रैल से 31 मार्च तक।  5. एक्ट से अभिप्राय है          :-  सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 21,1860. (ग) संस्थान के संचालन हेतु आवश्यक संशोधित नियम एवं शर्त:- 1. संस्थानमें तीन आग्रलिखित प्रभाग अर्थात् समितियां जो क्रमशः प्रशासनिक समिति, सलाहकार समिति और कार्यकारिणी समिति है, जिसकी पूरी-पूरी जिम्मेवारी व जवाबदेही प्रत्येक समिति के पदासीन सदस्य की होगी। 2. प्रशासनिक समिति में मुख्यतः तीन स्थाई पद/सदस्य तथा दो अस्थाई पद/सदस्य होंगे जिनमें स्थाई पदों का चुनाव संस्थान के कार्यकारीणी द्वारा तब तक नहीं किया जाएगा जब तक यह पद स्वयं अपनेआप किसी विशेष कारणवश रिक्त ना हो जाते हैं अथवा रिक्त होने जैसा प्रतीत होता है अथवा रिक्त होने जैसा स्थिति पैदा हो जाता है अथवा उक्त सदस्यों द्वारा ऐसा कोई कार्य किए जाने पर जो समाज हित में, संस्थान हित में तथा मानवता हित में न हो अथवा असंवैधानिक हो। वही समिति के दो अस्थाई पदों का चुनाव की अवधि प्राय: 5 वर्षों की होगी, जिनका चुनाव सलाहकार समिति के पारित प्रस्ताव के आलोक में कार्यकारिणी के पदाधिकारी अथवा सदस्यों के संतोषजनक कार्यावधि को देखते हुए किया जाएगा। अर्थात् इस दोनों पदों पर कार्यकारीणी के सदस्यों को पदोन्नति कर चयनित किया जाएगा, जिनकी चुनावी अवधि 5 साल की होगी। 3. कार्यकारिणी समिति में सदस्यों की कुल संख्या न्यूनतम् 11 तथा सदस्यों की कुल अधिकतम् संख्या आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है। कार्यकारिणी समिति के प्रायः सभी पद व सदस्य अस्थाई होगें। इनका कार्यकाल समय 5 साल का होगा। किन्तु आवश्यकता अनुसार किसी विशेष स्थिति/परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए कार्यकारीणी के प्रस्ताव तथा सलाहकार समिति के पूर्ण सहमति पर कार्यकारिणी के मध्यावधी चुनाव भी कराये जा सकते हैं। 4. सलाहकार समिति में सदस्यों की कुल संख्या न्यूनतम् 09 तथा सदस्यों की कुल अधिकतम् संख्या आवश्यकतानुसार संस्थान हित को ध्यान में रखते हुए यथासंभव बढ़ाया जा सकता है। इस समिति के प्रायः सभी सदस्यों के नाम का चुनाव प्रायः संस्थान के प्रशासनिक समिति के बैठक में पूर्ण सहमति के आधार पर तय किया जाएगा। 5. संस्थान के किसी भी चुनावी पद या नाम के प्रस्ताव का अधिकार प्रायः संस्थान के प्रशासनिक समिति को ही प्राप्त है, जिसपर विचार कर सहमति या असहमति देने का अधिकार प्रायः कार्यकारीणी एवं सलाहकार समिति की है। 6. संस्थापक संस्थान के अस्थाई पदों में अध्यक्ष पद के नाम का प्रस्ताव व्यवस्थापक के लिखित अनुशंसा के आधार पर कार्यकारिणी में प्रस्तुत करेंगे, जिस पद व पदाधिकारी के सेवाकाल की पूरी-पूरी जवाबदेही व जिम्मेवारी व्यवस्थापक की होगी। 7. संस्थापक संस्थान के अस्थाई पदों में सचिव तथा कोषाध्यक्ष के नाम का प्रस्ताव संचालक के लिखित अनुशंसा के आधार पर कार्यकारिणी में प्रस्तुत करेंगे जिन पदों व पदाधिकारीयों के कार्यकाल की पूरी-पूरी जिम्मेवारी व जवाबदेही संचालक की होगी। 8. संस्थान के कार्यकारिणी के सदस्यों का व्यक्तिगत डीड/अनुबंध कार्यकारणी अध्यक्ष के द्वारा लिया जाएगा, जिसमें गवाह एवं पहचान सचिव एवं कोषाध्यक्ष के द्वारा लिया जाएगा। 9. संस्थान के कार्यकारिणी अध्यक्ष का व्यक्तिगत डिड/अनुबंध संस्थान के संस्थापक द्वारा लिया जाएगा, जिसकी गवाही व्यवस्थापक एवं पहचान संचालक के द्वारा लिया जाएगा। 10.संस्थान के कार्यकारिणी सचिव एवं कोषाध्यक्ष का व्यक्तिगत अनुबंध संस्थान के संस्थापक द्वारा लिया जाएगा जिसकी गवाही संचालक एवं पहचान व्यवस्थापक के द्वारा लिया जाएगा। 11.संस्थान के किसी भी समिति के किसी भी सदस्य का संस्थान के चल या अचल संपत्ति में व्यक्तिगत रूप से कोई अधिकार नहीं होगा, ना हीं भविष्य में ही कोई सदस्य  शेयर के लिए कोई दवा ही कर सकता है। 12.कोई भी कार्यकर्ता या सदस्य किसी भी कारण से संस्थान से अपना संबंधविच्छेद संस्थान के लाभ-हानि का हिसाब लिए बगैर कभी भी किसी भी समय कर सकता है, परन्तु संस्थान से संबंधविच्छेदित सदस्य को अपने पद से हटने के एक निर्धारित समय के पहले-पहले संस्थान में अपना व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का हिसाब तथा अपना त्यागपत्र लिखित रूप से देना होगा। 13.संस्थान के किसी भी समिति के समस्त सदस्यों का अनुबंध व्यक्तिगत रूप से संस्थान के साथ होगा, इसके उल्लंघन पर संस्थान द्वारा उक्त सदस्य/सदस्यों के विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई/ कार्यवाही की जा सकती है। 14.संस्थान के सदस्यों का परिचय पत्र संस्थापक के लिखित आदेश पर कार्यकारिणी अध्यक्ष द्वारा व्यवस्थापक/  संचालक के हस्ताक्षर के साथ निर्गत किया जाएगा। 15.संस्थान के कार्यकारिणी से कोई भी आवश्यक पारित नियम एवं प्रस्ताव स्वीकृति के लिए क्रमशः व्यवस्थापक, संचालक तथा तदनोपरान्त संस्थापक के पास भेजी जाएगी, जिसको अस्वीकृति की  स्थिति में व्यवस्थापक तीन बार, संचालक दो बार तथा संस्थापक दो बार पुनः कार्यकारिणी में अविलम्ब पुनः विचार के लिए भेज सकते हैं कारण सहित। नोट:- कोई भी पारित प्रस्ताव मूल रूप से खारिज करने का अधिकार संस्थान द्वारा संस्थापक को प्राप्त है। ऐसे प्रस्ताव जो समाजहित में, राष्ट्रहित में अथवा संस्थान के पूर्णता विकास के हित में न हो। अर्थात् कार्यकारिणी द्वारा ऐसे पारित प्रस्ताव जिसे संस्थापक द्वारा मूल रूप से खारिज कर दिया जाता है, ध्यान रहे भविष्य में ऐसे प्रस्ताव को पुनः पारित कराने का प्रयास कार्यकारिणी द्वारा भविष्य में कभी भी किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जाएगा। 16.संस्थान के किसी भी सदस्य के लिए प्रशासनिक समिति द्वारा तय आदेश या दण्ड जो चाहे उक्त कार्यकर्ता के लिए व्यक्तिगत रूप से ग्राह्य हो या ना हो अथवा व्यक्तिगत हित में न हो परन्तु संस्थान हित में हो, समाज हित में हो तथा संस्थान के विकास के लिए अतिआवश्यक हो तो उक्त सदस्य के लिए मान्य होगा तथा उक्त सदस्य सतर्कता एवं वादेइकरारता के साथ इसका शख्ती से पालन करेंगे। इसके लिए सभी कार्यकर्ताओं का संस्थान में उक्त सदस्य की प्राथमिक सदस्यता प्राप्ति व ज्वायनिंग के साथ का ही बना अनुबंध- पत्र संस्थान में प्रमाण के लिए रखा रहेगा। 17.संस्थान सामाजिक विकास तथा ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार अपने कार्यक्षेत्र में कहीं भी, किसी भी समय अपने मूल नियम एवं शर्तों के अंतर्गत नए सदस्यों की नई समिति का गठन कर सकता है, जिनका व्यक्तिगत अनुबंध संस्थान के नियमानुसार बनेगा, इसके आधार पर नवगठित संघ समिति कार्य करेगी। 18.संस्थान का कोई भी सदस्य अगर संस्थान कार्य से कहीं बाहर संस्थान द्वारा भेजा जाता है तो उसका पूरा-पूरा खर्च संस्थान वहन करेगा। 19.कोई भी संस्थान सदस्य अपनी स्वैच्छा से संस्थान विकास में अपने निजी पूंजी का निवेश कर सकता है तथा वे निवेशित राशि की मांग कभी भी एक निश्चित और निर्धारित तिथि के अंतराल को बनाए रखते हुए कर सकता है, जिसका भुगतान संस्थान अपने बताए गए नियमों के अनुसार करेगा। 20.संस्थान को पूर्ण अधिकार प्राप्त होगा कि वह किसी भी समय समाज हित के लिए तथा संस्थान हित के लिए आवश्यकता पड़ने या समझे जाने पर किसी भी सदस्य की सदस्यता रद्द कर सकता है या किसी भी पदासीन पदाधिकारी को आवश्यकतानुसार अविश्वास पारित कर पद से निलंबित कर सकता है या उनकी सदस्यता स्थाई रूप से रद्द कर सकता है। 21.इस संस्थान के कार्यक्षेत्र के जो भी नवगठित संघ समितियां बनेगी उनके अध्यक्ष, सचिव तथा कोषाध्यक्ष का व्यक्तिगत अनुबंध संस्थान के व्यवस्थापक द्वारा कार्यकारिणी अध्यक्ष के गवाही तथा सचिव की पहचान के साथ किया जाएगा। 22.आवश्यकतानुसार तथा समयानुसार कभी भी संस्थान के मूल नियमावली में संशोधन संस्थान के प्रशासनिक समिति के सहमति तथा कार्यकारणी और सलाहकार समिति के समर्थन पर  फेरबदल अर्थात् घटाव- बढ़ाव किया जा सकता है। 23.संस्थान का कोई भी सदस्य या पदाधिकारी अगर संस्थान के आदेश- निर्देश के विरुद्ध किसी भी राजनीतिक पद के लिए अगर अपने नाम का पर्चा भरता है, तो उसके पर्चा दाखिला के साथ ही संस्थान से उक्त सदस्य या पदाधिकारी की सदस्यता स्वतः , मूलतः पूर्णरूपेण रद्द मानी जाएगी। 24.अगर कोई भी संस्थान सदस्य जो संस्थान से एक निश्चित आय प्राप्त करता हो अपने लिए व्यक्तिगत ऋण के लिए आवेदन कर सकता है जिसके देय अधिकतम राशि का निर्धारण संस्थान के प्रशासनिक समिति द्वारा तय किया जाएगा। 25.संस्थान के किसी भी स्थाई या अस्थाई पद अगर किसी भी कारण से आकस्मिक रिक्त हो अथवा रिक्त होने की स्थिति में हो तो उस पद के उत्तराधिकारी के नाम का प्रस्ताव अथवा चुनाव करने का अधिकार केवल संस्थापक को ही प्राप्त है, जिसमें व्यवस्थापक तथा संचालक का लिखित अनुशंसा लेना संस्थापक का परमकर्तव्य एवं नैतिकधर्म है। 26.संस्थान के कार्यकारिणी अथवा सलाहकार समिति की बैठक जब भी होगी या कराई जाएगी तो उसमें संस्थान के प्रशासनिक समिति की उपस्थिति अनिवार्य होगी। 27.संस्थान के विकास को ध्यान में रखते हुए तथा समाजहित को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार संस्थान के प्राधिकारिक पदों की संख्या अथवा पदासीन पदाधिकारिक सदस्यों के कार्यभार में किसी भी तरह का परिवर्तन संस्थान के प्रशासनिक समिति द्वारा सलाहकार समिति के दिशानिर्देश के आधार पर कभी भी, किसी भी समय किया जा सकता है। 28.संस्थान के मूल नियमावली में किसी भी तरह का बदलाव/संशोधन अगर संस्थान द्वारा किया जाता है, तो इसकी सूचना निबंधन कार्यालय को अविलम्ब निश्चित समयान्तर्गत भेज दिया जाएगा। (घ) सदस्यता की प्राप्ति:- (i) कोई भी भारतीय नागरिक जो संस्थान के नियम एवं शर्तों का पालन निष्ठापूर्वक करते हों, वे इस संस्थान के सदस्य बन सकते हैं। (ii) कोई भी व्यक्ति अगर संस्था का सदस्य बनना चाहता है तो वह 21/- सदस्यता शुल्क तथा 100/- प्रति माह मासिक शुल्क देकर संस्थान का सदस्य बन सकता है। (ड़) सदस्यता से विमुक्ति:-  निम्न परिस्थितियों में संस्थान सदस्यों की सदस्यता स्वतः समाप्त मानी जाएगी अथवा समाप्त की जा सकती है- (i) किसी सदस्य की मृत्यु होने पर। (ii) पागल या दिवालिया घोषित होने पर। (iii) कार्यकारिणी द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर। (iv) न्यायालय द्वारा दंडित होने पर। (v)  निर्धारित सदस्यता शुल्क समय सीमा के अंदर या लगातार 3 माह तक जमा नहीं होने पर। (vi) स्वयं त्यागपत्र देने पर। (vii) संस्थान के नियमों एवं उद्देश्यों के विरुद्ध आचरण करने पर। (viii)संस्थान के आदेश निर्देश के बिना किसी सदस्य या पदाधिकारी के द्वारा किसी भी परिस्थिति में कहीं भी किसी राजनीतिक पद के लिए अगर प्रसाद दाखिला किया जाता है, तो वैसी स्थिति में उक्त सदस्य या पदाधिकारी की सदस्यता स्वत: , मुलत: स्थाई रूप से निरस्त हो जाएगा। (च) कार्यकारिणी समिति का गठन:- (i) कार्यकारिणी समिति में पदाधिकारी सहित न्यूनतम 11 तथा अधिकतम 21 सदस्य होंगे।  नोट:- आवश्यकतानुसार संस्थान अपने कार्यक्षेत्र में आवश्यक एवं उत्सुक तथा संस्थान के मूल नियमावली व उद्देश्यों को मानने वाले व्यक्ति को अपना सदस्य बना सकता है, जो संस्थान के कार्यकारिणी सदस्य नहीं होंगे। अर्थात् वे लोग संस्थान के कार्यकारिणी सदस्योत्तर सदस्य माने जाएंगे। जो संस्थान के पद चुनाव में भाग नहीं लेंगे। जिनमें सदस्यता शुल्क के राशि का निर्धारण संस्थान के तीनों समितियों के संयुक्त बैठक में प्रशासनिक समिति के प्रस्ताव, सलाहकार समिति के विश्वास एवं न्यायोचित सलाह तथा कार्यकारिणी समिति के सहमति व पारित प्रस्ताव के आधार पर तय किया जाएगा। (ii) कार्यकारिणी समिति का कार्यकाल 5 साल का होगा परन्तु निवृत्ति सदस्य सलाहकार समिति के विश्वास तथा प्रशासनिक समिति के सहमति पर पुनः चुने जा सकते हैं। (iii) किसी भी कार्यकारिणी सदस्य को किसी भी चुनावी पद के लिए एक बार, दो बार या कई बार तक पूर्व पद पर या किसी नए पद के लिए चुना जा सकता है, परन्तु तब जबकि उक्त सदस्य का पूर्व का कार्यकाल संस्थाहित तथा समाजहित के लिए संतोषजनक रहा हो। परन्तु इसका निर्णय प्रशासनिक समिति तथा सलाहकार समिति के संयुक्त बैठक में दोनों समिति सदस्यों के एकाविचार से तथा संस्थापक की अध्यक्षता में संस्थानहित को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। (iv) यदि किसी कारणवश समिति के कोई पद रिक्त होता है तो शेष अवधि के लिए उक्त पद पर कार्यकारिणी से ही किसी सदस्य को मनोनीत किया जा सकता है किन्तु वार्षिक बैठक में उक्त पद के लिए विधिवत् चुनाव करा लिया जाएगा।  (छ) संस्थान के आय के स्रोत:- संस्थान के आय का निम्न स्रोत है- (i)  सदस्यता शुल्क एवं मासिक शुल्क द्वारा। (ii)  सरकारी, गैर सरकारी दान-अनुदान, विशेष शुल्क, चन्दा तथा ऋण द्वारा। (iii) संस्था द्वारा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री द्वारा। (iv) व्यक्तिगत सरकारी, गैरसरकारी, अर्धसरकारी संस्थानों, बैंकों तथा स्थानीय निकायों से सहायता एवं अनुदान प्राप्त कर उसका सही निवेश एवं विनियोग द्वारा।  (v) अपने स्वविवेक, इच्छानुसार कोई भी संस्थान सदस्य अगर चाहें तो संस्थान में अपना निजि पूँजी का निवेश कर सकता है।  (ज) पारिश्रमिकी(मानदेय)देय का आधार :-   संस्थान के समस्त सदस्य एवं पदाधिकारी संस्थान में दैनिक या मासिक पारिश्रमिक (मानदेय) के आधार पर ही कार्यरत रहेंगे। अर्थात् संस्थान में कोई भी पदाधिकारी या सदस्य अथवा कर्मी स्थाई वेतनमान पर नहीं रखा जा सकेगा। मानदेय के राशि का निर्धारण संस्थान के प्रशासनिक समिति के द्वारा सलाहकार समिति के रायविमर्श के उपरांत पारित प्रस्ताव के आलोक में तय किया जाएगा। संस्थान द्वारा उक्त अधिभारित राशि का निर्धारण संस्थान के प्रशासनिक समिति तथा सलाहकार समिति के संयुक्त बैठक में संस्थानहित को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाएगा, जो संस्थान लाभांश का प्रतिशत में निम्न होगा- (झ) संस्थान लाभांश/परिश्रमिकी वितरण:-                                             संस्थान के शुद्ध स्वाधिकृत निधि में    -  40%                                                                     सामाजिक विकास कार्य में                - 10%                                                                    कर्मयोगी सदस्यों के कल्याण में          - 50%  कार्यकर्ता परिश्रमिकी वितरण:-                       संस्थान लाभांश का 50% = कार्यकर्ता पारिश्रमिकी वितरण का 100%                                                                   प्रशासनिक समिति के सदस्यों के लिए      - 40%                                                                   कार्यकारिणी समिति के सदस्यों के लिए   -  55%                                                                   कार्यकर्ता प्रोत्साहन के लिए                  -  05%   (ञ) संस्थान के मुख्य समिति तथा समिति सदस्यों के कर्तव्य एवं अधिकार:-    1. प्रशासनिक समिति- (i) संस्थान के प्रशासनिक समिति में संस्थान के प्रशासनिक तथा प्राधिकारीक कार्य देखे जाएंगे। (ii) संस्थान के ऐसे कार्य जो किसी कारणवश उलझे हों, इस समिति द्वारा देखे जाएंगे। (iii)संस्थान के किसी भी समिति की आपातकालीन बैठक यह समिति कभी भी, किसी भी समय बुला सकती है। (iv) संस्थान के किसी भी समिति के सभी तरह के कार्य कलापों तथा व्यवस्था पर यह समिति बराबर कड़ी नजर रखेगी। (v) संस्थान की इस समिति को यह पूर्ण अधिकार प्राप्त होगा कि वह संस्थान के किसी भी सदस्य या किसी भी पदाधिकारी/पदासीन अधिकारी को किसी वाद-विवाद अथवा किसी भी उलझे तथ्यों के निपटारे के लिए कारण बताओं नोटिस देकर जवाब के लिए अपने प्रशासनिक समिति के बैठक में बुला सकता है। (vi)आवश्यकतानुसार किसी भी पदाधिकारी या सदस्य को उचित एवं न्यायोचित दण्ड एवं सजा से संबंधित प्रस्ताव पारित करने अथवा देने का अधिकार संस्थान द्वारा इस समिति को प्राप्त है। (vii)संस्थान के किसी भी समिति में कैश संबंधित कोई भी कार्यान्वयन प्रशासनिक समिति के निर्देश के बगैर संपादित नहीं किया जाएगा। (viii)संस्थान के प्रशासनिक कार्यों के सही संचालन हेतु इस समिति के पदासीन सदस्यों को संस्थान द्वारा निम्नलिखित व्यक्तिगत पदाधिकार प्राप्त है:- १.संस्थापक-   संस्थान के संस्थापक प्रशासनिक समिति का अध्यक्ष होता है तथा संस्थान का भी प्रधान चेयरमैन है, अतः समस्त प्रशासनिक एवं प्राधिकारिक कार्य इनके ही देखरेख में संपन्न किए जाएंगे। इसलिए संस्थापक को कोई भी निर्णय व्यक्तिगत भावना, राजनीतिक तथा धार्मिक स्तर से ऊपर उठकर लेना चाहिए, जो मूलतः संस्थाहित में, समाजहित में हो तथा सामाजिक रूप से ग्राह्य एवं धार्मिक रूप से ग्राह्य हो। संस्थापक को इसके लिए निम्नाधिकार तथा दायित्व को ध्यान में रखना आवश्यक है- (i) संस्थापक किसी भी सदस्य से व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर सकता है जो आवश्यकतानुसार गोपनीय रखा जा सकता है अथवा सार्वजनिक। (ii) संस्थापक कभी भी किसी भी समय अगर संस्था कार्य से कहीं बाहर जाते हैं तो उसका पूरा-पूरा खर्च संस्थान स्वयं वहन करेगा तथा ये अपने सहायतार्थ संस्थान के किसी भी पदाधिकारी को संचालक एवं व्यवस्थापक के अनुशंसा के आधार पर आदेश कर सकता है। (iii) संस्थापक आवश्यकतानुसार व्यवस्थापक और संचालक के लिखित अनुशंसा के आधार पर कभी भी किसी भी समय संस्थान के किसी भी समिति की आपातकालीन बैठक बुला सकता है। (iv) संस्थान के जो भी बाहरी कार्य होंगे वह प्रयः संस्थापक के द्वारा व्यवस्थापक एवं संचालक की पूर्णतः तथा परस्पर सहयोग से देखे जाएंगे। (v) संस्थान के संयुक्त बैठक जब भी बुलायी जाएगी तो इसकी अध्यक्षता संस्थापक ही स्वयं करेंगे। २.व्यवस्थापक- संस्थान के व्यवस्थापक संस्थान का उपाध्यक्ष है, इनके ऊपर संस्थान के मैनेजमेंट संबंधित सभी कार्य, नई क्षेत्रीय संघ समितियों के गठन की जवाबदेही, संगठन तथा नवनिर्मित संघ समितियों के सर्वांगीण विकास संबंधित कार्यभार देखने पड़ते हैं। इन कार्यों के सही संचालन हेतु संस्थान द्वारा व्यवस्थापक को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार दिए गए हैं- (i) ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए तथा संस्थाहित को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार व्यवस्थापक संस्थापक के लिखित आदेश या सहमति पर कार्यकारिणी अध्यक्ष द्वारा अपने कार्यक्षेत्र में कहीं भी, किसी भी समय नए संघ समिति का गठन कर सकता है जिसकी पूरी-पूरी जवाबदेही, जिम्मेवारी तथा उत्तरदायित्व व्यवस्थापक पर होगी।  (ii) व्यवस्थापक संस्थान के मैनेजमेंट संबंधित सभी कार्यों का स्वयं उत्तरदाई होंगे, जो यह संचालक के पूर्ण सहयोग के द्वारा संपन्न करेंगे। (iii) व्यवस्थापक संस्थापक के लिखित आदेश पर कभी भी, किसी भी समय संस्थान के किसी भी समिति की आपातकालीन बैठक बुला सकता है। (iv) व्यवस्थापक आवश्यकतानुसार तथा संस्थानहित को और समाजहित को ध्यान में रखते हुए एवं अपने व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठकर संस्थान के किसी भी पदाधिकारी अथवा सदस्य या कार्यकर्ता के खिलाफ उचित दण्ड का प्रस्ताव संचालक के सहमति से संस्थापक के समक्ष रख सकता है। (v) व्यवस्थापक आवश्यकतानुसार कार्यकारिणी या किसी भी संघ समिति के किसी भी सदस्य या पदासीन पदाधिकारी से कभी भी किसी भी समय संस्थान के विकास कार्य से संबंधित कोई भी प्रश्न पूछ सकता है, जिसका जवाब उक्त सदस्य को अविलम्ब मौखिक या लिखित रूप से व्यवस्थापक के समक्ष रखना होगा। ३.संचालक-   संस्थान के संचालक संस्थान का प्रधान सचिव के रूप में कार्य करेगें। अर्थात् सीधे शब्दों में संस्थान का संचालक संस्थान का प्रधान सचिव है। संस्थान के संचालक के ऊपर संस्थान संचालन का पूरा-पूरा हक, अधिभार तथा उत्तरदायित्व होता है। संस्थान के कैश संबंधित सभी तरह के कार्यों की पूरी-पूरी जवाबदेही व जिम्मेवारी संस्थान संचालक पर होगी, जिसके लिए संचालक का संबंध सीधे-सीधे संस्थान के कार्यकारिणी अथवा किसी भी नवगठित संघ समितियों के सचिव तथा कोषाध्यक्ष से होगी तथा उनके पूरे-पूरे कार्यों की जवाबदेही एक तरह से संस्थान संचालक की है। इसके लिए संस्थान संचालक को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार प्रदान करता है :- (i) संचालक संस्थान के कार्यकारिणी अध्यक्ष, सचिव एवं कोषाध्यक्ष से कभी भी किसी भी समय संस्थान के कैश से संबंधित किसी भी तरह का प्रश्न कर सकता है, जिसका जवाब उक्त सदस्य को अविलम्ब देय होगा। (ii) संचालक किसी भी संघ समिति के क्रियाकलाप, पद चुनाव तथा कैश संबंधित सभी कार्यों पर हमेशा चौकसी बरतते हुए ध्यान रखेंगे, क्योंकि इन तथ्यों का जवाब संस्थान के सामूहिक वार्षिक बैठक में संचालक के द्वारा ही देय होगा। (iii) संचालक से संस्थापक द्वारा कभी भी संस्थान के चल या अचल राशि/ परिसंपत्ति का आकलन मांगा जा सकता है, अतः संस्था के पूरे कार्य क्षेत्र पर संचालक का नेत्र टिकी होनी चाहिए। (iv)संस्थान के किसी भी समिति के सदस्य या पदाधिकारी की जो भी परिश्रमिकी तय हो उसके सही समय से भुगतान की जवाबदेही एवं उत्तरदायित्व संस्थान के संचालक की है।  (v) संस्थान के किसी भी समिति के अथवा संघ समिति के किसी भी पदाधिकारी अथवा सदस्य के लिए आवश्यकतानुसार तथा संस्थानहित और समाजहित में आवश्यक किसी भी तरह के दण्ड अथवा सजा को निर्णय रूप से संस्थापक के समक्ष प्रस्तावि करने का अधिकार संस्थान द्वारा संचालक को प्राप्त है। ४.संयोजक- संयोजक पद किसी भी संस्था का अत्यंत ही महत्वपूर्ण, अतिसक्रिय, जिम्मेवार, जवाबदेह,जवाबदेह, कर्तव्यनिष्ठ एवं संस्थान के अतिसंवेदनशील पद होता है अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो संयोजक किसी भी संस्था या समिति का हृदय और हृदय में निवास करने वाला आत्मा होता है। संयोजक संस्थान के प्रशासनिक समिति और कार्यकारिणी समिति तथा सलाहकार समिति को एक दूसरे से जोड़ने का माध्यम अर्थात् कड़ी का काम करेगा तथा संस्थान की हर विशेष अर्थात् अतिगोपनीय से गोपनीय तथ्यों को जानने- समझने वाला पद है। जिसके सही-सही तथा पूर्ण जिम्मेवारी को देखते हुए संस्थान द्वारा संस्थान के संयोजक को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार दिए गए हैं- (i) संयोजक किसी भी पदाधिकारी से उचित एवं आवश्यक प्रश्न कर सकता है और उसका अविलंब जवाब युक्त पदाधिकारी से लिखित अथवा मौखिक रूप से मांग सकता है जिसका उत्तर उक्त पदाधिकारी अथवा सदस्य को अविलंब देय होगा। (ii) संयोजक संस्थान के संस्थापक का मुख्य सलाहकार होगा, इसलिए संस्थान के समस्त समिति में हो रहे क्रियाकलापों से अविलंब एवं पूर्णरूपेण संस्थापक को लिखित अथवा मौखिक रूप से अवगत कराते रहना संयोजक का मुख्य कर्तव्य, अधिकार एवं जिम्मेवारी होगी।  (iii)संस्थान के किसी भी समिति की बैठक, संस्थान के समस्त समिति सदस्यों की संयुक्त बैठक अथवा संस्थान के होने वाले समस्त आमसभा के सभा का संचालन संस्थान का संयोजक ही करेगें। (iv)संस्थापक की अनुपस्थिति में संस्थान के कोष से लेकर क्षेत्र के कार्यक्रमों की व्यवस्था तक पर पूरी तरह से कड़ी एवं पहनी नजर रखना संयोजक का परमकर्तव्य एवं अपना विशेषाधिकार होगा। (v) संयोजक किसी भी पदाधिकारी अथवा सदस्य पर किसी भी तरह के शक की स्थिति में उक्त पदाधिकारी अथवा सदस्य के कार्यशैली, क्रियाकलाप अथवा पदाधिकार के उल्लंघन का गुप्त रूप से/ आपातकालीन/ औचक निरीक्षण व जाँच कर सकता है तथा उक्त सदस्य या पदाधिकारी के गलत होने पर उनके विरुद्ध आवश्यक, उचित एवं संवैधानिक सजा या दण्ड का आदेश कर सकता है, जो संस्थापक के स्वीकृति के बाद तुरन्त से लागू माना जाएगा।  (vi)संयोजक संस्थान के संस्थापक को सामाजहित, संस्थानहित तथा राष्ट्रहित में कोई भी अपना व्यक्तिगत अथवा क्षेत्र से प्राप्त अनुरोध पर लिया गया परामर्श लिखित अथवा मौखिक रूप से दे सकता है जिस पर अविलंब विचार करना संस्थापक का परमकर्तव्य होगा। (vii)संस्थान के तरफ से पत्राचार का कार्य संस्थान के संयोजक ही देखेंगे। (viii)संयोजक संस्थापक का अभिन्न अंग होगा अतः इनको संस्थापक अथवा संस्थान के हर संभव तथा हर तरह की गोपनीयता बनाए रखना चाहिए अर्थात् उपरोक्त तथ्यों की पूरी-पूरी जवाबदेही संयोजक की अपनी खुद की होगी। ५.संपादक- किसी भी संस्थान या व्यवस्था में संपादक उस संस्थान या व्यवस्था के उद्देश्यों एवं सफलताओं को समाज के बीच अर्थात् दूर-दराज के क्षेत्रों के घर-घर तक पहुंचाने वाला माध्यम होता है, अर्थात् संस्थान के मनोभाव और भाषा को क्षेत्र के घर-घर तक पहुंचाने और लोगों को सरल रूप से समझाने का काम करता है संपादक। युवा जागृति स्वयं सेवी सहायता संस्थान के संपादक को भी संस्थान के द्वारा निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार दिए गए हैं :- (i) संस्थान के प्रत्येक खबर या विचार को जनसाधारण तक समाचार पत्र, रेडियो एवं आवश्यकता अनुसार टीवी चैनलों के माध्यम से पहुंचने का कार्य एवं जिम्मेवारी तथा जवाबदेही संस्थान के संपादक को है, जिसका पूरा-पूरा खर्च वहन संस्थान द्वारा देय होगा। (ii) संपादक मूल रूप से हमेशा संस्थापक के साथ-साथ रहकर संस्थान के विकास से संबंधित कार्य देखेंगे। (iii)संपादक संस्थान के विकास से संबंधित कोई भी राय विमर्श मौखिक या लिखित रूप से संस्थापक को देते रहेंगे। (iv)संस्थापक जब भी संस्थान के काम से कहीं भी बाहर जाते हैं तो आवश्यकतानुसार उनके साथ प्रायः संस्थान के संपादक उनके सहायतार्थ जाएंगे। (v)संस्थान द्वारा संपादक को यह अधिकार प्राप्त होगा कि वे संस्थान विकास, समाज विकास, राष्ट्र विकास से संबंधित कोई भी प्रश्न संस्थान के किसी भी सदस्य या पदाधिकारी से कर सकते हैं, जिसका जवाब लिखित या मौखिक रूप से संपादक के कथनानुसार देना उक्त सदस्य की जवाबदेही, कर्तव्यता व संवैधानिक विवसता होगी। (vi)संपादक द्वारा अगर किसी भी सदस्य या पदाधिकारी को संस्थाहित, समाजहित तथा राष्ट्रहित में कोई भी कार्य गलत करते हुए पाया जाता है तो उसके लिए न्यायोचित दण्ड या सजा का प्रस्ताव संपादक अपने विवेकानुसार प्रशासनिक समिति के समक्ष अथवा संस्थापक के समक्ष रख सकता है, जिस पर अविलम्ब विचार कर निर्णय देना उक्त समिति या संस्थापक का परम कर्तव्य एवं प्रथम अधिकार होगा। (vii)संपादक पद का मूल रूप से संस्थान के सहायक सलाहकार का पद होगा अर्थात् समाजहित, संस्थानहित व राष्ट्रहित में कोई भी अपना राय-विमर्श मौखिक अथवा लिखित रूप से देते रहना संपादक का मुख्य कर्तव्य एवं परम नैतिक धर्म होगा। 2. सलाहकार समिति तथा समिति के पदाधिकारीयों के कर्तव्य एवं अधिकार :- यह समिति संस्थान की सबसे निर्णायक समिति है, जिसका निर्णायक सुझाव व सलाह संस्थान एवं समाज दोनों के तदन्तर विकास हेतु अतिआवश्यक एवं शिरोधार्य होगा। संस्थान के सलाहकार समिति का यह प्रथम और सर्वोच्च अधिकार, कर्तव्य एवं परमधर्म है कि वे आवश्यकतानुसार समय-समय पर हर तरह के न्यायोचित व संस्थानहित एवं समाजहित को ध्यान में रखकर अपना सलाह संस्थान को देते रहे। इस समिति के सदस्यों की न्यूनतम आयु 50 वर्ष से ऊपर होना आवश्यक है। इस समिति की आपातकालीन बैठक कभी भी किसी भी समय आवश्यक समझे जाने पर संस्थापक द्वारा बुलाई जा सकती है। अर्थात् इस समिति की विशेष रूप से आवश्यकता संस्थापक को है। इस समिति को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार संस्थान द्वारा प्राप्त है:- (i)  संस्थान को समय-समय पर आवश्यक एवं उचित सलाह देते रहना। (ii) संस्थान के किसी भी वाद-विवाद के निपटारे में संस्थापक को उचित सलाह देना।  (iii) कार्यकारिणी द्वारा पारित वैसे प्रस्ताव जो व्यवस्थापक द्वारा तीन बार, संचालक द्वारा दो बार तथा संस्थापक द्वारा एक बार अस्वीकृत कर पुनः विचार हेतु कार्यकारिणी में लौटाए गए हों, को पुनः स्वीकृति हेतु संस्थापक के पास दुबारा भेजे गए हो,  सलाहकार समिति का निर्णय अंतिम निर्णय माना जाएगा। इसके उपरान्त ही वह प्रस्ताव संस्थापक द्वारा स्वीकृत किए जा सकते हैं अथवा इसे स्थाई रूप से खारिज किया जा सकता हैं।  नोट:- ध्यान रहे स्थाई रूप से खारिज किया गया प्रस्ताव भविष्य में कभी भी, किसी भी हाल में दोबारा प्रस्ताव रूप में पारित करवाने का किसी भी समिति या सदस्य/पदाधिकारी द्वारा प्रयास नहीं किया जा सकता है। सलाहकार समिति के पदाधिकारीयों को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार संस्थान द्वारा दिए गए हैं- १.अध्यक्ष- संस्थान द्वारा सलाहकार समिति के अध्यक्ष को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार प्रदान किए गए हैं - (i)  बैठक में इस समिति की अध्यक्षता करना। (ii) सलाहकार समिति के अध्यक्ष संस्थान के आंतरिक अंकेक्षक होंगे। (iii)सचिव द्वारा किए गए उचित एवं न्यायोचित निर्णय को अपने हस्ताक्षर द्वारा सभा से पारित करना। (iv)संस्थापक को समय-समय पर उचित सलाह देते रहना। (v) संस्थान के समस्त सदस्यों में सामंजस्य बनाए रखने के लिए अपना उचित मार्गदर्शन एवं निर्देशन देते रहना। २.सचिव- संस्थान द्वारा सलाहकार समिति के सचिव को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार प्रदान किए गए हैं-  (i) सलाहकार समिति के सचिव के निर्णय को अंतिम निर्णय मानते हुए संस्थापक द्वारा सार्वजनिक किया जा सकता है।  (ii) संस्थान द्वारा सलाहकार समिति के सचिव को यह अधिकार प्राप्त है कि वह संस्थान के किसी भी समिति द्वारा अथवा समिति सदस्यों के द्वारा किए गए आय- व्यय के हिसाब का मांग लिखित या मौखिक रूप से कभी भी, किसी भी समय कर सकते हैं, जिसका जवाब उक्त सदस्य या पदाधिकारी को अविलम्ब यथासंभव देय होगा। गलत पाए जाने पर उक्त व्यक्ति/सदस्य/ पदाधिकारी के विरुद्ध कोई भी न्यायोचित दण्ड या सजा तय कर लागू करने हेतु संस्थापक को लिखित रूप से देने का सर्वोच्च अधिकार सलाहकार समिति के सचिव को संस्थान द्वारा स्थाई रूप से प्राप्त है। (iii) संस्थान के किसी भी समस्या के निदान में संस्थापक को उचित निर्णय लेने में हमेशा अपना बहुमूल्य, न्यायोचित एवं सर्वोच्च सुझाव समयानुसार देते रहें।  (iv) संस्थान के सलाहकार समिति के सचिव महोदय का प्रथम एवं सर्वोच्च कर्तव्य है कि वे अपने लिए गए निर्णय को सलाहकार समिति अध्यक्ष के लिखित अनुशंसा एवं निर्देश के बाद ही संस्थापक महोदय के समक्ष पेश करें। 3. कार्यकारिणी समिति- कार्यकारिणी समिति किसी भी संस्थान की काया होती है, जिसमें मूल रूप से संस्थान विकास, संस्थान समृद्धि, संस्थान का क्षेत्र विस्तार तथा संस्थान के सर्वांगीण विकास संबंधित सारे कार्यक्रम देखे जाते हैं। जिसके लिए संस्थान द्वारा इस समिति के सभी पदासीन पदाधिकारी एवं सदस्यों को निम्नवत् कर्तव्य एवं अधिकार दिए गए हैं :- १.अध्यक्ष- अध्यक्ष पर संस्थान के पूरे-पूरे सर्वांगीण विकास की पूरी-पूरी जवाबदेही, जिम्मेवारी तथा उत्तरदायित्व होता है। अतः संस्थान द्वारा कार्यकारिणी अध्यक्ष को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार प्राप्त है- (i) अध्यक्ष को यह पूर्ण अधिकार प्राप्त होगा कि वह अपने कार्यकारिणी की आपातकालीन बैठक किसी भी समय सचिव के राय- विमर्श पर तथा व्यवस्थापक के सहमति और संस्थापक के लिखित स्वीकृति पर बुला सकता है। (ii) संस्थान के समस्त क्षेत्रीय कार्यों तथा संस्थान के क्षेत्र विस्तार संबंधित सभी कार्यों की जवाबदेही एवं जिम्मेवारी अध्यक्ष की है। (iii) संस्थान के कार्यक्षेत्र की संपूर्ण व्यवस्था का श्रेय मूल रूप से अध्यक्ष को है। (iv) अध्यक्ष को यह अधिकार प्राप्त है की आवश्यकता अनुसार वह कार्यकारिणी के किसी भी सदस्य अथवा पदाधिकारी से कोई भी प्रश्न कर सकता है जो संस्थानहित में,  समाजहित में तथा संस्थान के विकास के लिए आवश्यक हो। उसका जवाब उक्त सदस्य/ पदाधिकारी को अविलम्ब और यथोचित देय होगा, अन्यथा उक्त सदस्य को अध्यक्ष द्वारा तय दण्ड या सजा स्वीकार्य होगा। ऐसा करना उक्त सदस्य की जिम्मेवारी, जवाबदेही और व्यक्तिगत विवशता होगी। २.सचिव-  कार्यकारिणी के सही संचालन का पूर्ण दायित्व सचिव के ऊपर होता है। अतः इसके लिए संस्थान द्वारा सचिव को निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार प्राप्त है:- (i) सचिव संस्थान के अध्यक्ष का हर पग- पग का साथी है, अतः कोई भी कार्य को कार्यान्वित करने के लिए सचिव को सही और उचित सलाह अध्यक्ष के समक्ष रखना चाहिए। (ii) संस्थान के सभी कार्यकर्ता के सही और उचित पारिश्रमिकी को कब और कैसे तथा किस प्रकार से देना उचित होगा इसकी जानकारी समय-समय पर संस्थान संचालक को बताना और संचालक के निर्देशानुसार इसकी व्यवस्था करने की जिम्मेवारी और जवाबदेही सचिव की है। (iii) कार्यकारिणी अध्यक्ष के सही और उचित निर्णय नहीं लेने की स्थिति में सचिव संचालक के आदेश तथा व्यवस्थापक के निर्देशानुसार कभी भी प्रशासनिक समिति की आपातकालीन बैठक बुलाने का आग्रह कर सकता है। (iv) सचिव संस्थान के सही संचालन हेतु अपना राय-विमर्श कभी भी संचालक के द्वारा अथवा स्वयं द्वारा संस्थापक को दे सकता है और आवश्यकतानुसार आवश्यक साधन व सामग्री की मांग मौखिक या लिखित रूप से व्यवस्थापक से कर सकता है। (v) नवगठित क्षेत्रीय संघ समितियों के सभी तरह के आय-व्यय पर नजर रखना सचिव का परम कर्तव्य एवं मूल दायित्व होता है। ३.कोषाध्यक्ष- कोषाध्यक्ष के ऊपर संस्थान के कोष (कैश)संबंधित पूरे कार्यनिष्पादन की जवाबदेही, जिम्मेदारी तथा उत्तरदायित्व होता है, अतः इनके कर्तव्य एवं अधिकार निम्न है-  (i) बैंक के लेनदेन का पूरा-पूरा कार्यभार कोषाध्यक्ष के ऊपर होता है। (ii) संस्था के सभी तरह के आय-व्यय का लिखित विवरण रखना कोषाध्यक्ष का परम कर्तव्य है। (iii) नवनिर्मित क्षेत्रीय संघ समितियों के कोष से संबंधित सभी तरह के लेनदेन तथा उनके वर्तमान स्थिति पर भी ध्यान रखना तथा उसका लिखित प्रमाण रखने की जिम्मेवारी तथा जवाबदेही कोषाध्यक्ष की होती है। (iv) कोषाध्यक्ष का यह परम कर्तव्य है कि वह संस्थान के कोष संबंधित सभी तरह के वस्तु- स्थिति का समयानुसार समय-समय पर जानकारी लिखित या मौखिक रूप से संस्थान के संचालक को देता रहे। (v) कोषाध्यक्ष का यह प्रथम उत्तरदायित्व है कि वह बैंक से किसी भी तरह के कैश निकासी के समय संस्थान से निर्गत चेक या आदेश को ध्यान से देख लें, कि उस पर संस्थान के संस्थापक या व्यवस्थापक का लिखित सहमति या हस्ताक्षर है कि नहीं अन्यथा इसका जवाब संस्थान को स्वयं कोषाध्यक्ष को ही देय होगा। (ट) कार्यकारिणी सदस्य-  कार्यकारिणी सदस्यों के भी निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार हैं :- (i) अध्यक्ष द्वारा रखे गए प्रस्ताव पर निष्पक्ष तथा निजीस्वार्थ एवं व्यक्तिगत भेदभाव से ऊपर उठकर विचार करना और उसे सर्वसम्मति से पास करना कार्यकारी सदस्यों का परम कर्तव्य एवं सर्वोच्च धर्म है। (ii) कार्यकारिणी सदस्यों का यह परम कर्तव्य है कि वह हरहाल में संस्थानहित, समाजहित तथा ग्रामीण विकास को ध्यान में रखकर अपना उचित सलाह अध्यक्ष या सचिव को दें।  (iii)कार्यकारिणी सदस्यों का यह नैतिक धर्म बनता है कि वह संस्थान द्वारा सौंपे गए कार्यों, जिम्मेवारी अथवा क्षेत्र के विकास हेतु सौंपे गए कार्यों को निष्ठा पूर्वक ईमानदारी से कार्यान्वित करने का सफल प्रयास करें।  (iv)कार्यकारिणी सदस्यों का यह नैतिक धर्म बनता है कि वह संस्थान द्वारा दिए गए क्षेत्र में संस्थान के लक्ष्य, उद्देश्यों व कार्यनीतियों के बारे में जन-जन तक आम लोगों को बताने-समझने का भरपूर प्रयास करें। (ठ) आम सभा के कर्तव्य एवं अधिकार- संस्थान के द्वारा किए जाने वाले आम सभा के दौरान उपस्थित हुए गणमान्य, बुद्धिजीवियों तथा सम्मानित आम लोगों को भी निम्नलिखित कर्तव्य एवं अधिकार शौंपे पर गए हैं- (i) संस्थान के सचिव द्वारा बताए गए आय-व्यय पर विचार कर संस्थान के समक्ष अपना स्वतंत्र विचार रखना। (ii) अध्यक्ष की राय से अन्य विषय पर विचार विमर्श देना।  (iii)संस्थानहित तथा समाजहित में अपना राय-विमर्श एवं उचित मार्गदर्शन देना (ड) संस्थान का प्रतीक चिन्ह, बोर्ड व बैनर निर्माण- संस्थान का अपना एक रंगीन (मल्टीकलर) प्रतीक चिन्ह होगा। जिसके मध्य आधार पर ज्ञानमेवजयते लिखा हुआ जिस पर खड़ा गदा लगा होगा और नीचे दोनों तरफ जय जवान- जय किसान लिखे हुए होंगे,  जिसके नीचले आधार पर वन्दे मातरम् लिखा हुआ एक बहुरंगी (मल्टी कलर) डिजाइन किया हुआ ”प्रतीक चिन्ह”  का यथासंभव डिजाइनिंग कराया जाएगा। जिसे संस्थान के द्वारा अपने पहचान चिन्ह के रूप में हमेशा संस्थान द्वारा उपयोग किया जाएगा। संस्थान के द्वारा अपने प्रतीक चिन्ह का उपयोग अपने लेटर पैड, सदस्यता रसीद, सदस्यों के अंशदान की रसीद, दान- अनुदान की रसीद,  अपने द्वारा देय बील- भाउचर एवं पत्राचार पर लगने वाले राउंड शील (गोल मुहर) आदि पर पहचान चिन्ह के रूप में किया जाएगा। यथासंभव समयानुसार इस प्रतीक चिन्ह (लोगो) का भी निबंधन निर्देशानुसार संबंधीत विभाग व कार्यालय से करा लिया जाएगा। संस्थान द्वारा उपयोग किए जाने वाले पहचान चिन्ह/प्रतीक चिन्ह का नमूना/प्रारूप निम्नवत है - (ढ) कोष का संचालन- संस्थान के कोष का संचालन अर्थात् बैंक खाता से राशि की जमा-निकासी का संचालन निम्नवत् निर्धारित किया गया है:- (i) बैंक खाता खोले जाने की स्थिति में संस्थान का एक आधारीय (मुख्य) बचत खाता निबंधीत मुख्यालय क्षेत्र के नजदीकी बैंक पंजाब नेशनल बैंक करोम में रहेगा। यह बचत खाता संस्थान के प्रशासनिक समिति के संस्थापक और व्यवस्थापक तथा कार्यकारणीय समिति के कोषाध्यक्ष तीनों पदाधिकारीयों के संयुक्त पद नाम से खोला जाएगा जिसमें बैंक खाते से किसी भी राशि की जमा- निकासी के लिए संस्थापक की अनुपस्थिति में व्यवस्थापक का हस्ताक्षर अन्यथा संस्थापक का हस्ताक्षर एवं कोषाध्यक्ष का हस्ताक्षर होना अति आवश्यक होगा। (ii) संस्थान का करेन्ट एकाउंट निबंधीत मुख्यालय गांव के जिला मुख्यालय में यथासंभव भारतीय स्टेट बैंक के शाखा में संस्थान के प्रशासनिक समिति के संस्थापक और कार्यकारिणी समिति के कोषाध्यक्ष दोनों पदाधिकारीयों के संयुक्त पदनाम से खोला जाएगा जिस खाते से किसी भी राशि की जमा-निकासी के लिए संस्थापक एवं कोषाध्यक्ष दोनों पदाधिकारीयों का हस्ताक्षर होना अति आवश्यक होगा। (iii) संस्थान की एफसीआरए में उपयोग किए जाने वाले करेन्ट एकाउंट निबंधीत मुख्यालय गांव के जिला मुख्यालय में यथासंभव भारतीय स्टेट बैंक के शाखा में संस्थान के प्रशासनिक समिति के संस्थापक और कार्यकारिणी समिति के कोषाध्यक्ष दोनों पदाधिकारीयों के संयुक्त पदनाम से खोला जाएगा, जिस खाते से किसी भी राशि की जमा-निकासी के लिए संस्थापक एवं कोषाध्यक्ष दोनों पदाधिकारीयों का हस्ताक्षर होना अति आवश्यक होगा। (iv) भविष्य में संस्थान के कार्य संचालन में यदि आवश्यकता महसूस होती है तो संस्थान द्वारा पारित प्रस्ताव के आलोक में संबंधित विभाग के निर्देशानुसार संस्थान के कार्यसंचालन के सुविधा- असुविधा को ध्यान में रखते हुए किसी भी उपयुक्त राष्ट्रीयकृत अथवा मान्यता प्राप्त बैंकों में निर्देशानुसार संस्थान का अथवा संस्थान द्वारा नवगठित संघ समितियों का बैंक खाता खोला जा सकता है, जिस खाते से किसी भी तरह के राशि की जमा-निकासी को संस्थान द्वारा पारित प्रस्ताव व आदेश-निर्देश के आलोक में संचालित किया जाएगा। (ण) बैठक- (i) संस्थान के प्रशासनिक, कार्यकारिणी, तथा सलाहकार समितियों की बैठक प्रायः क्रमशः साप्ताहिक, मासिक तथा त्रैमासिक की जाएगी। (ii) संस्थान का संयुक्त बैठक साल में दो बार 26 जनवरी तथा 15 अगस्त को पूरे हर्षोल्लाह के साथ राष्ट्रध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रमों के साथ संस्थान के संस्थापक की अध्यक्षता में किया जाएगा। (iii) संस्थान का संयुक्त बैठक संस्थान गठन के वर्षगांठ अथवा अन्य वृहद आयोजन को लेकर कभी भी बुलाई जा सकती है। (iv) संस्थान के किसी भी संयुक्त बैठक या आयोजित समारोह की संपूर्ण व्यवस्था की जिम्मेवारी व जवाबदेही व्यवस्थापक तथा संचालक की होगी। (त) बैठक की सूचना- संस्थान के द्वारा संस्थान के समिति सदस्यों तथा संस्थान सदस्योंत्तर सदस्यों अथवा आमलोगों को निम्नवतरूप से बैठक की सूचना अथवा जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाएगी - (i) प्रशासनिक समिति के सदस्यों को बैठक की सूचना 12 घंटे पूर्व दिए जाएंगे। (ii) कार्यकारिणी तथा सलाहकार समिति के सदस्यों को बैठक की सूचना 5 दिन पहले दिए जाएंगे। (iii) आमसभा के सदस्यों को बैठक की सूचना 7 दिन पहले दिया जाएगा। (iv) आपातकालीन बैठक की सूचना 24 घंटा पहले दिया जाएगा।  (v)  बैठक की सूचना डाक पंजी या विशेष दूत के द्वारा भेजा जाएगा। (vi) बैठक की सूचना संस्थापक के निर्देशानुसार टेलिफोनिक भी दी जा सकती है। विशेष परिस्थिति में संस्थापक द्वारा किसी भी समिति की आपातकालीन बैठक 3 घंटे के अंदर भी बुलाकर आयोजित की जा सकती है जिसकी समुचित व्यवस्था करने  की जिम्मेवारी व जवाबदेही संस्थान के संचालक की होगी। (थ)निधि का अंकेक्षण (ऑडिट)- (i) संस्थान के आय-व्यय का लेखा नियमित रूप से संस्थान में रखा जाएगा तथा सलाहकार समिति के निर्देशन में प्रशासनिक समिति द्वारा नियुक्त अंकेक्षक (ऑडिटर) से प्रत्येक वर्ष संस्थान के निधि का अंकेक्षण कराया जाएगा। जिसका रिपोर्ट निबंधन महानिरीक्षक को समय-समय से भेजी जाएगी। (ii)निबंधन महानिरीक्षक कभी भी अपने विवेकानुसार संस्थान का अंकेक्षण किसी भी मान्यता प्राप्त चार्टर्ड अकाउंटेंट से करा सकते हैं, इस हेतु चार्टर्ड अकाउंटेंट का शुल्क संस्थान द्वारा वहन किया जाएगा। (द) कोरम (गणपूर्ति)-   प्रत्येक बैठक का कोरम कुल सदस्यों का साधारण बहुमत होगा। कोरम के अभाव में बैठक स्थगित भी की जा सकती है, जिसकी सूचना सदस्यों को अविलम्ब दे दी जाएगी। (ध) कानूनी कार्यवाही- संस्थान पर या संस्थान द्वारा कानूनी कर्रवाई/कार्यवाही संस्थान के संस्थापक के पद नाम से किया जाएगा तथा अधिवक्ता की नियुक्ति प्रशासनिक तथा सलाहकार समिति के संयुक्त बैठक में पूर्ण राय- विमर्श के बाद तय किया जाएगा। संस्थान के द्वारा किसी अन्य के विरुद्ध अथवा कार्यक्षेत्र में किसी के द्वारा संस्थान पर यदि कानूनी कार्रवाई किए जाने के मामले की स्थिति - परिस्थिति बनती है, तो ऐसी स्थिति में यदि मामला सिविल कोर्ट का बनता है तो दर्ज वाद की सुनवाई का केंद्र जिला न्यायालय सिवान अथवा उच्च न्यायालय की स्थिति में राज्य मुख्यालय पटना ही माना जाएगा। (न) संस्थान के विघटन एवं विघटनोंपरान्त संपत्ति की व्यवस्था- (i) संस्थान का विघटन संस्था अधिनियम 1860 की धारा 13 के आलोक में सरकार के अनुमोदन प्राप्त करने के बाद ही किया जाएगा। (ii) आमसभा के 3/5 सदस्यों के द्वारा प्रस्ताव पारित होने तथा उसपर प्रशासनिक समिति और सलाहकार समिति के पूर्णतः और सर्वसहमति के बाद ही संस्थान का विघटन किया जाएगा। (iii) संस्थान के विघटनों पर जो भी चल- अचल संपत्ति रहेगी, वह किसी भी सदस्य या सदस्योत्तर सदस्यों में नहीं बांटी जाएगी। बल्कि आमसभा के निर्देशन में और प्रशासनिक समिति के पूर्ण सहमति तथा एकाविचार के साथ किए गए निर्णय के तहत किसी अन्य समान उद्देश्यों वाली दूसरी संस्था अथवा सरकार को दे दी जाएगी। *प्रमाणित किया जाता है कि यह संशोधित नियमावली की सच्ची प्रतिलिपि है।* ***********
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